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नासिक–त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ महाकुंभ मेलामहाराष्ट्र शासन की मुद्रा
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Aerial view of Ramtirth on the Godavari at sunset

सिंहस्थ महाकुंभ 2027 एक परिचय

सिंहस्थ कुंभ मेला क्या है?

शब्द का अर्थ

संस्कृत शब्द "कुंभ" का अर्थ घड़ा, कलश या मटका है। घर की पूजा में, गृहप्रवेश में, विवाह समारोह में हम जो पानी से भरा कलश स्थापित करते हैं, उसे भी कुंभ कहते हैं। भारतीय परंपरा में कलश समृद्धि, पूर्णता और जीवन का प्रतीक है। उसमें पानी होता है, पत्ते होते हैं, ऊपर नारियल होता है; यानी उसमें विश्व का ही एक छोटा नमूना माना गया है। "मेला" यानी जमावड़ा, भेंट, एक साथ इकट्ठा होना। वास्तव में इसके पीछे अमृत से भरे कलश की कथा है।

यहाँ हमें "सिंहस्थ" शब्द भी बार-बार दिखाई देगा। नासिक-त्र्यंबकेश्वर और उज्जैन में यह मेला गुरु (बृहस्पति) ग्रह के सिंह राशि में होने पर लगता है, इसलिए इसका नाम सिंहस्थ पड़ा है। महाराष्ट्र में कई लोग "कुंभ मेला" और "सिंहस्थ" इन शब्दों का प्रयोग एक ही अर्थ में करते हैं। तकनीकी दृष्टि से देखें तो कुंभ सर्वव्यापी नाम है और सिंहस्थ नासिक-त्र्यंबकेश्वर के कुंभ को दिया जाने वाला स्थानीय, ज्योतिष-आधारित नाम है।

महाकुंभ जानकारी केंद्र

सिंहस्थ से पहले, उसके दौरान और बाद में — एक श्रद्धालु को जो भी जानकारी चाहिए, सब एक ही जगह।

Pilgrims taking the holy dip in the Godavari

स्नान तिथियाँ एवं मुहूर्त

अमृत स्नान और पर्व स्नान की तिथियाँ, हर घाट पर स्नान के समय के साथ।

स्नान तिथियाँ देखें
Carved stone temple shikhara

अखाड़े एवं शोभायात्राएँ

13 अखाड़े और शाही शोभायात्रा का क्रम।

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Nashik Municipal Corporation dispensary tent

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Ancient carved stone niche on a temple wall

मंदिर एवं पवित्र स्थान

रामतीर्थ, त्र्यंबकेश्वर, पंचवटी और कुंभ मेले से जुड़े अन्य पवित्र स्थलों के बारे में जानें।

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समुद्र मंथन की कथा

हर बड़ी परंपरा के पीछे एक कथा खड़ी होती है। लोगों के लिए केवल नियम पर्याप्त नहीं होते, उन्हें "यह ऐसा क्यों?" इस प्रश्न का भावनात्मक उत्तर चाहिए होता है। कुंभ मेले के मामले में वह उत्तर समुद्र मंथन की कथा में मिलता है।

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Illustration of the Samudra Manthan: Devas and Asuras churning the cosmic ocean

नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ मेला: एक अलग स्वर

चार कुंभ-स्थलों में से नासिक-त्र्यंबकेश्वर की कुछ खास विशेषताएँ हैं। यहाँ दो स्थानों पर स्नान होता है: नासिक शहर के पंचवटी क्षेत्र में स्थित रामतीर्थ और लगभग तीस किलोमीटर दूर त्र्यंबकेश्वर में स्थित कुशावर्त तीर्थ। परंपरा के अनुसार शैव साधु त्र्यंबकेश्वर में और वैष्णव साधु नासिक के रामतीर्थ में स्नान करते हैं।

नासिक

नासिक रामायण से जुड़ा स्थान है। वनवास के दौरान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने गोदावरी तट पर पंचवटी में निवास किया।

त्र्यंबकेश्वर

त्र्यंबकेश्वर एक ऐसा स्थान है जो दो कारणों से प्रसिद्ध है। एक है यहाँ का शिव मंदिर, जिसे बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। दूसरा है गोदावरी का उद्गम।

स्नान का आध्यात्मिक महत्व


कुंभ मेले की सारी तैयारी, सारा गणित और सारी शोभायात्राएँ अंततः एक छोटे-से कृत्य तक ले जाती हैं: मनुष्य नदी में उतरता है, हाथ में जल लेता है, कुछ क्षण मन को शांत करता है और स्नान करता है। बाहर से देखने वाले को यह साधारण लग सकता है। नहाते तो हम रोज़ ही हैं, फिर नदी का यह स्नान अलग क्यों? इस प्रश्न का उत्तर खोजने का अर्थ है भारतीय अध्यात्म में जल का स्थान समझना।

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A sadhu blowing a conch on the banks of the Godavari

सिंहस्थ: ज्योतिषशास्त्रीय आधार

नासिक और उज्जैन के कुंभ मेले को "सिंहस्थ" कहते हैं। यह शब्द दो भागों से बना है: "सिंह" और "स्थ"। सिंह यानी सिंह राशि, और स्थ यानी स्थित रहने वाला। जब गुरु ग्रह (बृहस्पति) सिंह राशि में स्थित होता है, वह काल सिंहस्थ है। यह नाम ही बता देता है कि इस मेले का समय कैलेंडर से तय नहीं होता; वह आकाश में एक ग्रह के स्थान से तय होता है।

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A sadhu meditating on the riverbank at sunrise

चार कुंभ-स्थलों की तुलना

कुंभ मेला चार स्थानों पर लगता है, यह अब हमें पता है: हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक-त्र्यंबकेश्वर। पर इन चारों मेलों को एक ही चश्मे से देखा जाए तो उनकी विशिष्टता खो जाती है।

  • प्रयागराज

    नदी: गंगा-यमुना-सरस्वती

  • हरिद्वार

    नदी: गंगा

  • उज्जैन

    नदी: क्षिप्रा

  • नासिक-त्र्यंबकेश्वर

    नदी: गोदावरी

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग


भारतीय शैव परंपरा में शिव की उपासना अनेक रूपों में होती है, परंतु उनमें सबसे प्रतिष्ठित रूप है ज्योतिर्लिंग। "ज्योति" का अर्थ है प्रकाश और "लिंग" का अर्थ है प्रतीक, चिह्न। ज्योतिर्लिंग अर्थात शिव का प्रकाशरूप प्रतीक। शिवपुराण में बारह ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है, और उनके नाम भारत के विभिन्न भागों के पवित्र स्थानों से जोड़े गए हैं।

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Trimbakeshwar temple shikhara with gold kalash, trishul and saffron flag

पंचवटी और रामायण का संबंध


रामायण के अरण्यकांड में ऐसा वर्णन है कि वनवास के तेरह वर्ष पूरे होने पर राम, सीता और लक्ष्मण अगस्त्य ऋषि की सलाह से गोदावरी के तट पर स्थित पंचवटी नामक स्थान पर निवास के लिए आए। यहाँ उन्होंने पर्णकुटी बनाई। पंचवटी अर्थात पाँच वटवृक्षों का समूह, ऐसी लोकप्रिय व्युत्पत्ति है।

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Illustration of Rama, Sita and Lakshmana beneath banyan trees by the Godavari

कुंभ और कल्पवास


कुंभ से जुड़ी एक और पुरानी परंपरा है कल्पवास। कल्पवास का अर्थ है मेले की अवधि में नदी किनारे रहकर सादगी से जीवन बिताना, दिन में नियत बार स्नान करना, एक समय भोजन करना, जप-ध्यान करना और दान-धर्म करना। प्रयागराज के माघ मेले में यह प्रथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। नासिक में भी कुछ श्रद्धालु और साधु पूरे पर्वकाल में गोदा तट पर निवास करने का व्रत लेते हैं।

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नदी के किनारे ध्यान में बैठे एक साधु

गोदावरी: दक्षिण की गंगा


नदी के किनारों पर ही संस्कृतियाँ जन्म लेती हैं, यह इतिहास का पहला पाठ है। सिंधु, गंगा, नील और टिग्रिस के तटों पर प्राचीन संस्कृतियाँ फली-फूलीं। दक्कन के पठार पर यही श्रेय गोदावरी को जाता है। उसकी घाटी में खेती के पहले प्रयोग हुए, व्यापारिक मार्ग विकसित हुए, मंदिर बनाए गए, संतों ने अभंग रचे और राजाओं ने राजधानियाँ बसाईं। कुंभ मेले की कथा में नदी केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि मुख्य पात्र है।

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मानसूनी आसमान के नीचे पंचवटी, नासिक में रामतीर्थ और गोदावरी के घाट

ऐतिहासिक छायाचित्र संग्रह

त्र्यंबकेश्वर मंदिर की श्वेत-श्याम तस्वीर: शिखर और छतें, दाईं ओर नंदी मंडप, पत्थर से बना आँगन
त्र्यंबकेश्वर मंदिर का सामान्य दृश्य, 1921–22
दक्षिण-पूर्व से त्र्यंबकेश्वर मंदिर की श्वेत-श्याम तस्वीर: गर्भगृह के ऊपर नक्काशीदार शिखर और सामने छतदार मंडप
त्र्यंबकेश्वर मंदिर के गर्भगृह और मंडप का सामान्य दृश्य, 1924–25
त्र्यंबकेश्वर मंदिर के नक्काशीदार पत्थर के नंदी मंडप की श्वेत-श्याम तस्वीर, जाली वाला द्वार और ऊपर नुकीली छत
त्र्यंबकेश्वर मंदिर के नंदी मंडप का सामान्य दृश्य, 1924–25