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गोदावरी: दक्षिण की गंगा

नदी है संस्कृति की मातृभूमि

नदी के किनारों पर ही संस्कृतियाँ जन्म लेती हैं, यह इतिहास का पहला पाठ है। सिंधु, गंगा, नील और टिग्रिस के तटों पर प्राचीन संस्कृतियाँ फली-फूलीं। दक्कन के पठार पर यही श्रेय गोदावरी को जाता है। उसकी घाटी में खेती के पहले प्रयोग हुए, व्यापारिक मार्ग विकसित हुए, मंदिर बनाए गए, संतों ने अभंग रचे और राजाओं ने राजधानियाँ बसाईं। कुंभ मेले की कथा में नदी केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि मुख्य पात्र है।

नदी की सांस्कृतिक रेखा

इस यात्रा को नक्शे पर खींचें तो एक सांस्कृतिक रेखा दिखाई देती है: त्र्यंबकेश्वर (शैव), नासिक (रामायण और वैष्णव), पैठण (सातवाहन और संत एकनाथ), नांदेड़ (सिख), बासर (विद्या की देवी), भद्राचलम (राम), राजमुंदरी (कला और शिक्षा) और अंतर्वेदी (सागर संगम)। इस रेखा पर विभिन्न भाषाओं, पंथों और कलाओं की अनेक परतें हैं। इसलिए कुछ अध्येता गोदावरी को "सांस्कृतिक महामार्ग" कहते हैं, क्योंकि वह मराठी, हिंदी, तेलुगु और अन्य भाषाई समाजों को एक गर्भनाल से जोड़ती है।