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नासिक-त्र्यंबकेश्वर कुंभ की ऐतिहासिक समयरेखा

किसी परंपरा का इतिहास लिखते समय तीन प्रकार के अभिलेख संभालने पड़ते हैं: पुराणकथाएँ, लिखित दस्तावेज़ और लोकस्मृति। नासिक के कुंभ के मामले में ये तीनों प्रकार एक-दूसरे में घुले-मिले दिखाई देते हैं। पुराणों में गोदावरी का माहात्म्य है, पर उनमें "नासिक कुंभ" ऐसा शब्द नहीं है। मुग़ल काल के फ़ारसी ग्रंथों में त्र्यंबक के मेले का उल्लेख है, पर वह "कुंभ" के रूप में नहीं। पेशवाई के कागज़-पत्रों में अखाड़ों के स्नान-क्रम के निर्णय मिलते हैं। ब्रिटिश गज़ेटियर में यात्रा के बंदोबस्त के अभिलेख हैं। और पिछले पचास वर्षों की घटनाओं के साक्षी आज भी जीवित हैं।

एक उपयोगी साधन: सिंहस्थ वर्षों को कैसे पहचानें?

कुंभ का कालक्रम प्रस्तुत करते समय पहले एक प्रश्न उठता है: किस वर्ष नासिक में सिंहस्थ हुआ होगा? ऐतिहासिक अभिलेख सभी वर्षों के उपलब्ध नहीं होते। लेकिन गुरु सिंह राशि में कब आया, यह खगोलीय गणित से पीछे जाकर भी निकाला जा सकता है। ऐसा गणित करने पर पिछले ढाई सौ वर्षों के सिंहस्थ वर्षों की सूची मिलती है। उसे अभिलेखों से मिलाकर देखें तो कुछ रोचक बातें सामने आती हैं।

गुरु का सिंह प्रवेश (अनुमानित)ऐतिहासिक संदर्भ
सितंबर 1789त्र्यंबक में शैव-वैष्णव संघर्ष, पेशवाओं का निर्णय
सितंबर 1801पेशवा शासन का उत्तरकाल
1813, 1825, 1837ब्रिटिश शासन का आरंभिक काल
अक्टूबर 1860, जून 1861निर्मल साधुओं की शोभायात्रा के विवाद
सितंबर 1872, मई 1873फिर से शोभायात्रा पर प्रतिबंध को लेकर विवाद
1884, 1896, 1908, 1920ब्रिटिश काल के नियमित सिंहस्थ
जुलाई 1932परंपरा फिर से शुरू हुई, स्वतंत्रता संग्राम का काल
1944, 1956स्वतंत्रता के बाद के आरंभिक मेले
1967-68, 1979-80आधुनिक संगठित व्यवस्था की ओर बढ़ते कदम
अगस्त 1991बीसवीं शताब्दी का अंतिम मेला
जुलाई 2003
जुलाई 2015स्मार्ट प्रौद्योगिकी का पहला बड़ा प्रयोग
अक्टूबर 2026 से जुलाई 2028आगामी सिंहस्थ