कुंभ मेले की सारी तैयारी, सारा गणित और सारी शोभायात्राएँ अंततः एक छोटे-से कृत्य तक ले जाती हैं: मनुष्य नदी में उतरता है, हाथ में जल लेता है, कुछ क्षण मन को शांत करता है और स्नान करता है। बाहर से देखने वाले को यह साधारण लग सकता है। नहाते तो हम रोज़ ही हैं, फिर नदी का यह स्नान अलग क्यों? इस प्रश्न का उत्तर खोजने का अर्थ है भारतीय अध्यात्म में जल का स्थान समझना।
कुंभ का केंद्रीय कृत्य है स्नान। परंपरा के अनुसार इस विशेष योग में नदी का जल अधिक पुण्यदायी हो जाता है, और उसमें स्नान करने से पाप धुल जाते हैं, ऐसा माना जाता है। कुछ श्रद्धालु इसे मोक्ष का मार्ग मानते हैं; कुछ लोग इसे केवल मन की शुद्धि, पितरों के स्मरण और कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर समझते हैं। स्नान के बाद दान, जप, ध्यान और साधु-संतों के दर्शन, यह सामान्य क्रम होता है।
वेदकाल से जल
भारतीय परंपरा में जल को केवल भौतिक द्रव्य नहीं माना गया है। ऋग्वेद में "आपः" अर्थात जलदेवताओं का स्वतंत्र सूक्त है, जिसमें जल को सुखदायी, आरोग्यदायी और पवित्र करने वाला कहा गया है। जल शरीर को धोता है, पर उसके साथ ही पाप को भी धोता है, यह धारणा वैदिक काल की है। धर्मशास्त्रों में स्नान के अनेक प्रकार बताए गए हैं। नित्य स्नान अर्थात प्रतिदिन सुबह किया जाने वाला, नैमित्तिक स्नान अर्थात ग्रहण, संक्रांति, अमावस्या, पूर्णिमा जैसे विशेष अवसरों पर किया जाने वाला, और काम्य स्नान अर्थात किसी विशिष्ट इच्छा की पूर्ति के लिए किया जाने वाला। कुंभ का स्नान मुख्यतः नैमित्तिक और कुछ हद तक काम्य माना जाता है, क्योंकि वह निश्चित पर्वकाल में और पुण्य-संचय के उद्देश्य से किया जाता है।
स्नान के साथ संकल्प करना भी एक पुरानी पद्धति है। संकल्प अर्थात हम कौन हैं, किस स्थान पर, किस काल में, किस उद्देश्य से यह कृत्य कर रहे हैं, यह उच्चारण करके घोषित करना। वह एक प्रकार का मानसिक अनुबंध होता है, जिससे साधारण कृत्य को प्रयोजन और गंभीरता मिलती है। आज के मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो संकल्प का अर्थ है उद्देश्य निश्चित करना, और उद्देश्य पक्का हो जाने पर अनुभव की गहराई बढ़ जाती है।


