हर बड़ी परंपरा के पीछे एक कथा खड़ी होती है। लोगों के लिए केवल नियम पर्याप्त नहीं होते, उन्हें "यह ऐसा क्यों?" इस प्रश्न का भावनात्मक उत्तर चाहिए होता है। कुंभ मेले के मामले में वह उत्तर समुद्र मंथन की कथा में मिलता है।
दुर्वासा का शाप और देवताओं का पतन
विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार कथा की शुरुआत इस प्रकार होती है। एक बार महर्षि दुर्वासा हाथ में दिव्य पुष्पमाला लेकर जा रहे थे। वह माला उन्हें एक विद्याधर स्त्री से मिली थी, और उसकी सुगंध चारों ओर फैल रही थी। रास्ते में उन्हें ऐरावत हाथी पर बैठा इंद्र मिला। दुर्वासा ने वह माला प्रसाद के रूप में इंद्र को दी। इंद्र ने उसे ले लिया, पर आदरपूर्वक माथे से लगाने के बजाय उसे हाथी के मस्तक पर रख दिया। हाथी ने उसे सूँड़ में पकड़कर पैरों तले रौंद डाला।
दुर्वासा अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध हैं। अपने प्रसाद का यह अपमान देखते ही उन्होंने इंद्र को शाप दिया, "जिस ऐश्वर्य का तुझे गर्व है, वह ऐश्वर्य तुझसे लुप्त हो जाएगा।" शाप लग गया। देवताओं का तेज कम हो गया, दैत्यराज बलि के नेतृत्व में असुरों ने देवताओं को पराजित कर दिया। स्वर्ग हाथ से निकल गया। देवता दीन होकर ब्रह्मदेव के पास गए और ब्रह्मदेव उन्हें भगवान विष्णु के पास ले गए।
मंदराचल, वासुकि और कूर्मावतार
समुद्र मथना हो तो मथानी (मथने का डंडा) चाहिए, रस्सी चाहिए और ऐसा आधार चाहिए जिस पर मथानी टिक सके। कथा के अनुसार मंदर पर्वत मथानी बना, वासुकि नाग रस्सी बना और भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुआ) अवतार लेकर अपनी पीठ पर मंदराचल को थामा।
पहला फल: हलाहल
किसी भी बड़े मंथन में पहले वह नहीं मिलता जो चाहिए; पहले वह बाहर आता है जो नहीं चाहिए। जब समुद्र मथा गया, तब सबसे पहले बाहर आया हलाहल (कालकूट) नाम का भयंकर विष। उसकी ज्वालाओं और धुएँ से तीनों लोक झुलसने लगे। देवता और असुर दोनों ही घबरा गए। प्राणिमात्र हाहाकार करने लगे।
सभी भगवान शंकर के पास दौड़े। शंकर ने करुणा से उस विष का पान करना स्वीकार किया। देवी पार्वती ने उनके कंठ पर हाथ रखा, और विष गले में ही अटका रह गया। इसलिए शंकर का कंठ नीला हो गया और उन्हें "नीलकंठ" नाम मिला।
चौदह रत्न
हलाहल के बाद मंथन फिर से शुरू हुआ और समुद्र से एक के बाद एक मूल्यवान वस्तुएँ बाहर आईं। परंपरा में उन्हें "चौदह रत्न" कहा जाता है।
अमृतकलश और संघर्ष
धन्वंतरि हाथ में अमृत से भरा कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए, और यहाँ से कथा का असली तनावपूर्ण भाग शुरू होता है। कलश देखते ही असुरों ने उसे छीन लिया। असुर संख्या और बल में अधिक थे। देवों को स्पष्ट दिख रहा था कि यदि असुरों ने अमृत पी लिया तो वे अजेय हो जाएँगे और त्रिभुवन उनके हाथ में चला जाएगा।
हताश देवों ने फिर से विष्णु की गुहार लगाई। तब विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया, अर्थात एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप। उसके मोहक रूप पर असुर मोहित हो गए। मोहिनी बोली, "तुम लोग झगड़ा मत करो, मैं न्याय से बँटवारा करती हूँ।" असुरों ने भोलेपन में कलश उसके हाथ में दे दिया। उसने देवों को एक पंक्ति में और असुरों को दूसरी पंक्ति में बिठाया, और पहले देवों को अमृत बाँटना शुरू किया।
फिर देवों ने अमृत पिया, असुर वंचित रह गए, क्रोधित हुए और देवों से भयंकर युद्ध हुआ। अमृत के प्रभाव से देव सशक्त हुए, और असुरों की पराजय हुई। स्वर्ग फिर से देवों के अधिकार में आ गया। यह विजय मुख्य रूप से बुद्धि की, नीति की और विष्णु की कृपा की विजय मानी जाती है।
अमृत की बूँदें चार स्थानों पर
जब देव और असुर अमृतकलश के लिए जूझ रहे थे, तब देवराज इंद्र का पुत्र जयंत वह कलश उठाकर भाग निकला। असुरों ने उसका पीछा किया। यह पीछा बारह दिन चला। देवों का एक दिन यानी मनुष्यों का एक वर्ष, इसलिए यह संघर्ष मनुष्यों के बारह वर्षों का माना जाता है।
पीछा किए जाने के दौरान जयंत ने कलश चार स्थानों पर रखकर विश्राम किया, या भागदौड़ में उसमें से कुछ बूँदें छलक गईं, ऐसा अलग-अलग कथाओं में बताया गया है। ये चार स्थान हैं हरिद्वार (गंगा), प्रयाग (गंगा-यमुना संगम), उज्जैन (क्षिप्रा) और नासिक-त्र्यंबकेश्वर (गोदावरी)। इन बूँदों के कारण वे नदियाँ अमृत के समान बन गईं, और जब ग्रहस्थिति उसी प्रकार मेल खाती है तब उन नदियों का जल विशेष पुण्यप्रद होता है, ऐसी श्रद्धा है।
गौतम ऋषि, अहिल्या और गाय: गोदावरी के जन्म की कथा
गोहत्या के पाप के निवारण के लिए गौतम ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की। शंकर प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा को भूलोक जाने की आज्ञा दी। गंगा शुरुआत में तैयार नहीं थी, क्योंकि वह शिव की जटा छोड़ना नहीं चाहती थी। पर शिव के कहने पर और गौतम की प्रार्थना पर वह ब्रह्मगिरि पर प्रकट हुई। गौतम ने उसके जल से स्नान किया और वे पापमुक्त हो गए। इसलिए इस नदी को "गौतमी" नाम मिला। "गोदा" नाम की व्युत्पत्ति भी गाय से जोड़ी जाती है: गोदा यानी गायें देने वाली, या गोहत्या के पाप से मुक्त करने वाली।
संत परंपरा का नाता
मराठी पाठक के लिए त्र्यंबकेश्वर का एक और नाता आत्मीयता का है, वह है संत परंपरा। संत ज्ञानेश्वर के ज्येष्ठ भ्राता और गुरु संत निवृत्तिनाथ की समाधि त्र्यंबकेश्वर में है, पौष महीने की कृष्ण एकादशी को त्र्यंबकेश्वर में निवृत्तिनाथ की यात्रा के लिए हज़ारों वारकरी दिंडियाँ लेकर आते हैं। यानी ज्योतिर्लिंग, गोदावरी का उद्गम और वारकरी संप्रदाय का एक महान गुरुस्थान, ये सब एक ही गाँव में एक साथ बसते हैं। शैव, वैष्णव और भागवत धर्म का सहअस्तित्व यहाँ सहज दिखाई देता है, और यही कुंभ मेले की सर्वसमावेशी भावना के लिए पोषक सिद्ध होता है।


