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त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग

त्र्यंबकेश्वर एक ऐसा स्थान है जो दो कारणों से प्रसिद्ध है। एक है यहाँ का शिव मंदिर, जिसे बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। दूसरा है गोदावरी का उद्गम।

ज्योतिर्लिंग क्या है?

भारतीय शैव परंपरा में शिव की उपासना अनेक रूपों में होती है, परंतु उनमें सबसे प्रतिष्ठित रूप है ज्योतिर्लिंग। "ज्योति" का अर्थ है प्रकाश और "लिंग" का अर्थ है प्रतीक, चिह्न। ज्योतिर्लिंग अर्थात शिव का प्रकाशरूप प्रतीक। शिवपुराण में बारह ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है, और उनके नाम भारत के विभिन्न भागों के पवित्र स्थानों से जोड़े गए हैं। वे इस प्रकार हैं: गुजरात में सोमनाथ, आंध्र प्रदेश में श्रीशैलम के मल्लिकार्जुन, मध्य प्रदेश में उज्जैन के महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर, उत्तराखंड में केदारनाथ, महाराष्ट्र में भीमाशंकर, उत्तर प्रदेश में काशी विश्वनाथ, महाराष्ट्र में त्र्यंबकेश्वर, झारखंड में वैद्यनाथ, गुजरात में नागेश्वर, तमिलनाडु में रामेश्वरम और महाराष्ट्र में घृष्णेश्वर।

सूची में महाराष्ट्र का वर्चस्व उल्लेखनीय है: भीमाशंकर, त्र्यंबकेश्वर और घृष्णेश्वर ये तीन ज्योतिर्लिंग (कुछ परंपराओं में औंढा नागनाथ और परली वैजनाथ पर भी दावा किया जाता है) इसी राज्य में हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन की यात्रा करना अनेक शिवभक्तों का जीवनभर का संकल्प होता है। उसमें त्र्यंबकेश्वर का स्थान विशेष है, क्योंकि यहाँ ज्योतिर्लिंग और गोदावरी का उद्गम एक साथ हैं, और यह कुंभ जैसे उत्सव का आधार भी है।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर के लिंग की विशेषता यह है कि वह ऊँचा खड़ा न होकर ज़मीन के एक गड्ढे में है, और उसमें तीन छोटे लिंग-सदृश उभार हैं, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। "त्र्यंबक" शब्द का अर्थ है तीन आँखों वाला, अर्थात शंकर।

मंदिर के बिल्कुल पास ही कुशावर्त तीर्थ है, जिसे गोदावरी के प्रवाह का दृश्य उद्गमस्थान माना जाता है। कुंड के चारों ओर पत्थर का मंडप है और उसकी वर्तमान संरचना इंदौर रियासत के सरदार रावसाहेब पारनेरकर ने बनवाई, ऐसा उल्लेख मिलता है। कुंभ मेले में शैव साधु यहीं स्नान करते हैं।