शब्द का अर्थ
संस्कृत शब्द "कुंभ" का अर्थ घड़ा, कलश या मटका है। घर की पूजा में, गृहप्रवेश में, विवाह समारोह में हम जो पानी से भरा कलश स्थापित करते हैं, उसे भी कुंभ कहते हैं। भारतीय परंपरा में कलश समृद्धि, पूर्णता और जीवन का प्रतीक है। उसमें पानी होता है, पत्ते होते हैं, ऊपर नारियल होता है; यानी उसमें विश्व का ही एक छोटा नमूना माना गया है। "मेला" यानी जमावड़ा, भेंट, एक साथ इकट्ठा होना। वास्तव में इसके पीछे अमृत से भरे कलश की कथा है।
यहाँ हमें "सिंहस्थ" शब्द भी बार-बार दिखाई देगा। नासिक-त्र्यंबकेश्वर और उज्जैन में यह मेला गुरु (बृहस्पति) ग्रह के सिंह राशि में होने पर लगता है, इसलिए इसका नाम सिंहस्थ पड़ा है। महाराष्ट्र में कई लोग "कुंभ मेला" और "सिंहस्थ" इन शब्दों का प्रयोग एक ही अर्थ में करते हैं। तकनीकी दृष्टि से देखें तो कुंभ सर्वव्यापी नाम है और सिंहस्थ नासिक-त्र्यंबकेश्वर के कुंभ को दिया जाने वाला स्थानीय, ज्योतिष-आधारित नाम है।
कहाँ, कितने वर्षों बाद, किस नदी पर?
कुंभ मेला भारत में चार स्थानों पर लगता है। हरिद्वार में गंगा के तट पर, प्रयागराज में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर (परंपरा के अनुसार सरस्वती को अदृश्य नदी माना जाता है), उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तीर पर और नासिक-त्र्यंबकेश्वर में गोदावरी के तट पर। इन चारों स्थानों का मेला सामान्यतः बारह वर्षों में एक बार आता है। किंतु चारों स्थानों पर यह एक ही वर्ष में नहीं होता। गुरु, सूर्य और चंद्र की स्थिति के अनुसार चारों स्थानों का क्रम तय होता है, इसलिए ऐसा दिखाई देता है कि सामान्यतः हर तीन वर्ष में कहीं न कहीं कुंभ लग रहा होता है।
बारह वर्षों की यह अवधि क्यों? इसका एक उत्तर खगोलीय है। गुरु ग्रह को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग ग्यारह वर्ष ग्यारह महीने लगते हैं। यानी वह हर राशि में सामान्यतः एक वर्ष रहता है और बारह राशियों का चक्र बारह वर्षों के आसपास पूरा होता है। दूसरा उत्तर पौराणिक है: अमृत के लिए देवों और दानवों के बीच बारह दिव्य दिनों तक युद्ध चला और देवों का एक दिन यानी मनुष्यों का एक वर्ष, ऐसा परंपरा कहती है। दोनों उत्तर एक-दूसरे से मेल खाते हैं और इसीलिए बारह का अंक कुंभ से सदा के लिए जुड़ गया।
चारों कुंभ स्थलों का एक साथ अवलोकन आगे दी गई तालिका में सरल रूप में प्रस्तुत किया गया है।
| स्थान | नदी | राज्य | प्रचलित ग्रहस्थिति | मेले का नाम |
|---|---|---|---|---|
| हरिद्वार | गंगा | उत्तराखंड | गुरु कुंभ राशि में, सूर्य मेष राशि में | कुंभ / अर्धकुंभ |
| प्रयागराज | गंगा-यमुना-सरस्वती संगम | उत्तर प्रदेश | गुरु वृषभ या मेष में, सूर्य-चंद्र मकर में | कुंभ / अर्धकुंभ / महाकुंभ / माघ मेला |
| नासिक-त्र्यंबकेश्वर | गोदावरी | महाराष्ट्र | गुरु और सूर्य सिंह राशि में | सिंहस्थ कुंभ |
| उज्जैन | क्षिप्रा | मध्य प्रदेश | गुरु सिंह राशि में, सूर्य मेष में | कुंभ |
यह तालिका देखने पर एक बात ध्यान में आती है: गुरु का सिंह राशि में होना नासिक-त्र्यंबकेश्वर और उज्जैन, इन दोनों स्थानों पर समान है। इसीलिए इन दोनों शहरों के मेले सामान्यतः एक ही वर्ष के आसपास आते हैं, और पहले भी कई बार साधुओं ने एक ही मौसम में उज्जैन और नासिक-त्र्यंबकेश्वर, दोनों स्थानों पर जाने की योजना बनाई है। अंतर केवल इतना है कि सूर्य की ति अलग होने के कारण उज्जैन का मेला वैशाख-चैत्र में (वसंत ऋतु में) और नासिक-त्र्यंबकेश्वर का श्रावण-भाद्रपद में स्थि (वर्षा ऋतु में) मनाया जाता है। यानी दोनों कुंभ एक ही ग्रह पर आधारित होने पर भी उनकी ऋतु, वातावरण और अनुभव अलग होते हैं।
यूनेस्को की मान्यता
दिसंबर 2017 में यूनेस्को ने कुंभ मेले को "मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत" (Intangible Cultural Heritage of Humanity) की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया। अमूर्त विरासत का अर्थ इमारतें या शिल्पकृतियाँ नहीं, बल्कि परंपराएँ, ज्ञान, कौशल और जीवंत प्रथाएँ हैं। कुंभ मेले में देखें तो यह पूरी तरह लागू होता है।
साधुओं और अखाड़ों की भूमिका
कुंभ मेला कहते ही आँखों के सामने सबसे पहले आते हैं वे साधु, शरीर पर भस्म लगाए, जटाधारी, हाथ में त्रिशूल और चिमटा। उनकी सेना लेकर निकलने वाली भव्य शोभायात्रा ही कई पाठकों के लिए कुंभ का मुख्य दृश्य होती है। इन साधुओं का संगठन "अखाड़े" नाम से जाना जाता है। अखाड़ा शब्द मूल रूप से कुश्ती के मैदान का है। पर साधु-परंपरा में इसका अर्थ शस्त्र और शास्त्र, दोनों का प्रशिक्षण देने वाला मठीय संघ हो गया।
इतिहासकार बताते हैं कि मध्ययुगीन काल में, विशेषकर मुगल और उसके बाद के काल में, तीर्थयात्रियों और मठों की रक्षा के लिए साधु-संघों ने लड़ाकू स्वरूप धारण किया। आगे ब्रिटिश काल तक मेले की व्यवस्था, कर, सुरक्षा और स्नान-क्रम तय करने में अखाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आज सामान्यतः तेरह मान्यता-प्राप्त अखाड़े हैं: दस शैव और तीन वैष्णव (बैरागी)।
नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ मेला: एक अलग स्वर
चार कुंभ-स्थलों में से नासिक-त्र्यंबकेश्वर की कुछ खास विशेषताएँ हैं। यहाँ दो स्थानों पर स्नान होता है: नासिक शहर के पंचवटी क्षेत्र में स्थित रामतीर्थ और लगभग तीस किलोमीटर दूर त्र्यंबकेश्वर में स्थित कुशावर्त तीर्थ। परंपरा के अनुसार शैव साधु त्र्यंबकेश्वर में और वैष्णव साधु नासिक के रामतीर्थ में स्नान करते हैं।
नासिक रामायण से जुड़ा स्थान है। वनवास के दौरान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने गोदावरी तट पर पंचवटी में निवास किया। त्र्यंबकेश्वर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और गोदावरी का उद्गम-स्थल ब्रह्मगिरि पर्वत के पास है। इसलिए नासिक-त्र्यंबकेश्वर के कुंभ में शैव और वैष्णव परंपराएँ, रामायण की स्मृति और नदी का उद्गम, ये सभी धागे एक साथ दिखाई देते हैं। यह विशेषता इसे अन्य कुंभ-स्थलों से अलग बनाती है।
कुंभ और कल्पवास
कुंभ से जुड़ी एक और पुरानी परंपरा है कल्पवास। कल्पवास का अर्थ है मेले की अवधि में नदी किनारे रहकर सादगी से जीवन बिताना, दिन में नियत बार स्नान करना, एक समय भोजन करना, जप-ध्यान करना और दान-धर्म करना। प्रयागराज के माघ मेले में यह प्रथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। नासिक में भी कुछ श्रद्धालु और साधु पूरे पर्वकाल में गोदा तट पर निवास करने का व्रत लेते हैं।


